सृष्टि के आदिकाल से ऋषि- मुनियों का देश भारत रहा है, जिसे प्राचीन में
आर्यावर्त्त कहा गया, जिसका तात्पर्य है, श्रेष्ठ जनों की निवास भूमि । ऐसे
तो प्राचीन संस्कृत और पाली ग्रंथों में हिन्दू का नाम कहीं नहीं मिलता ।
यह माना जाता है कि, प्राचीन ईरान देश के निवासी, ’सिंधु नदी’ को ’हिन्द”
कहते थे, क्योंकि वे ’स’ का उच्चारण ’ह’ करते थे । धीरे-धीरे सिंधु पार के
निवासियों को वे ’हिन्दू’ कहने लगे । भारत के बाहर ’हिन्दू’ शब्द का उल्लेख
’अवेस्ता’ में हुआ है ।
हमारे देश में एक से एक गुणी , महात्मा-योगी ,साधु-संत पैदा हुए, जिन्हें
कालान्तर में भगवान का रूप भी माना गया । उन्होंने बताया,’ जन्म और मृत्यु’
दोनों ही मिथ्या है , यह जगत भ्रमपूर्ण है । ’ब्रह्म” और मोक्ष’ सत्य है ।
। मोक्ष से ही ब्रह्म हुआ जा सकता है । इसके अलावा, स्वयं के अस्तित्व को
कायम करने का, और कोई रास्ता नहीं है । ब्रह्म को जानकर , ब्रह्ममय हो जाने
वाले को ही हम ब्रह्मलीन कहते हैं ।
वेद कहता है, ईश्वर अजन्मा है । उसे जन्म लेने की कोई आवश्यकता नहीं; वह न
जन्म लिया, न लेगा । ईश्वर एक है, देवी-देवताएँ अनेक हैं और इसी अनेक के
आधार पर , पूजा- अर्चना के नियम बाँटे गये । धीरे-धीरे भारतीय ढ़ाँचे में,
अलग-अलग युगों में,समय ,काल और परिस्थितियों के अनुसार ज्यों-ज्यों बदलाव
आता गया; त्यों-त्यों भाषाएँ, रीति- रिवाज , परम्परा, अलग-अलग क्षेत्रों की
संस्कृति में भिन्नताएँ होती गईं । भारत में हिन्दू, बौद्ध, सिक्ख, जैन,
अनेक धर्मों और सम्प्रदायों का आविर्भाव हुआ; और यहीं से हमारे ऋषि – मुनि
भी बँटते चले गये । आज सभी मुनियों के पहनावे, एक जैसे नहीं रहे । कोई
सादे, कोई केसरिया, तो कोई बिल्कुल ही वस्त्रविहीन हो गये । इसका प्रभाव भी
विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग पड़ा । कहीं लोग पूरे के पूरे समुदाय
मांसाहारी हैं, तो कहीं बिल्कुल निरामिष । लोग अपने- अपने संतों के बताये
राह पर चलने लगे । रहन-सहन, खान-पान भले ही एक दूजे से अलग हो, मगर, सभी
संतों की एक वाणी रही । ’ सच बोलो, दीन-दुखियों पर दया करो, पशु- पक्षियों
से प्यार करो । क्रूरता नरक की ओर ले जायगा, इसलिए, समय रहते इसे समझो’ ।
आज भी इन उपदेशों को देने वाले बाबाओं की कमी हमारे देश में नहीं है । यहाँ
फ़सल की तरह बाबाएँ उग रहे हैं । एक को छोड़ो, दूसरे को अपनाओ । कोई कमी नहीं
है; लेकिन ये उपदेशी बाबा, खुद कितना इन उपदेशों को ग्रहण कर चलते हैं ; ये
तो, मैं ही क्यों, आप भी भलीभाँति जानते हैं । मेरे कहने का मतलब है कि आज
के बाबाओं में और प्राचीन बाबाओं में कितना फ़र्क आ गया ? पहले ऋषियों
–मुनियों का अवतार,समाज के लिए होता था और आज, अपनी रंगरेलियाँ मनाने के
लिए । ज्यों चोली और लहँगा, धोती और अंगा; त्यों बाबाओं का धर्म और धंधा है
। धर्म की आढ़ में, समाज की आँखों में धूल झोंकने वाले, इन बाबाओं का संतलत,
कश्मीर से कन्याकुमारी तक सीमित नहीं बल्कि पूरा विश्व है । रूपये-पैसे,
धन-दौलत, इतनी कि इसका हिसाब खुद नहीं कर सकते; अपने शयन-कक्ष में मशीनें
लगा रखे हैं । बैठने के लिए सोने का सिंहासन, मेज पर पूरे बागान की कलियाँ;
कुछ खिली
,कुछ अधखिली । सोने के लिए हीरे-मोतियों से जड़े पलंग, पाँव पोछने के लिए
चाँदी का पायदान, दौड़ने
के लिए बड़ी-बड़ी मोटर- कारें , खिड़कियों के मखमली परदों पर विश्व सुन्दरियों
की छपी तस्वीरें, जिन्हें बाबा जब चाहते हैं, अपने पैसे के मंत्र-जाप से
सशरीर धरा पर उतार, अपनी सेवा- सुश्रुषा में लगा देते हैं । इस प्रकार क्या
कुछ नहीं है ,इन बाबाओं के पास ? जिन्हें छूने हम-आप तरसते हैं, उन्हें वे
व्यवहार कर अपने चमचों में बाँट देते हैं ।
लेकिन इन्हें गुनहगार क्यों मानें, इसमें इनका क्या दोष ? किसी को मुफ़्त की
रोटियाँ तोड़ने मिले, तो क्यों नहीं तोड़े ? इस ऐश व आराम की जिंदगी, उनकी
खनदानी नहीं; हम और आप देते हैं । हमारे पास गरीबों को देने के लिए कुछ
नहीं; लेकिन साधु- संतों के सामने रुपयों के बंडलें खोलकर रख देते हैं । जब
किसी भिखारी को इतने पैसे अचानक आ जाये, तो वह क्या करे; यही तो करेंगे,जो
बाबाएँ कर रहे हैं । इसके लिए हम इन्हें ही दोष क्यों दें; दोषी तो हम भी
हैं । हम अंधविश्वास के अंधेरे में, स्वर्ग की चाह रखते हैं । हमारे और
स्वर्ग के बीच कोई आड़े न आये, इन बाबाओं को खुश रखने के लिए घूस स्वरूप
पैसे और धन देते हैं । लेकिन क्या, जो इन्सान खुद नारकीय जीवन बिता रहा है,
वह आपको स्वर्ग पहुँचाने में मदद कर सकेगा ; कतई नहीं । इसलिए तो संत कबीर
कहते हैं —
गुरु लोभी शिष्य लालची,दोनों खेले दावँ ।
दोनों बूड़े बापुरे ,चढ़ि पाथर की नाव ॥
अर्थात गुरु और चेला, दोनों ही लोभी हों । दोनों अग्यान, पत्थर स्वरूप नाव
पर बैठेहों ; तो उसे हर हाल में डूबना है ।
तुलसीदास जी की वाणी में ——
बंदऊँ संत असज्जन चरना । दुखप्रद उभय बीच कछु बरना ।।
बिछुड़त एक प्रान हरि लेहीं । मिलत एक दुख दारुण देहीं ॥
अर्थात संत और असंत, दोनों ही दुख देने वाले होते हैं । अन्तर बस इतना है
कि एक (संत) जो बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं और दूसरे (असंत) मिलते हैं
,तब दारुण दुख देते हैं ।
अगर गलती वश किसी ऐसे गुरु के शरण में हैं, तो इसे शीघ्र तज दीजिए (संत
कबीर की वाणी में ) —
झूठे गुरु के पक्ष को तज, न कीजे वार
द्वार न पावै शब्द का, भटके बारम्बार ॥
मेरे कहने का कतई यह अर्थ नहीं है कि आज सभी बाबाएँ दुराचारी और भोगी हैं ।
मगर आज भी कुछ अपवाद में हैं, जो समाज के सम्मान के अधिकारी हैं । ये समाज
के लिए जीते हैं, अपने लिए नहीं । इनके ग्यान का आलोक, धरती पर ही नहीं;
पूरे ब्रह्मांड में फ़ैला हुआ है । इन्होंने अपने ग्यान-चक्षु से, आसमान में
हो रहे, चाँद- तारों के समस्त गति-विधियों को देखा । देखकर अपने शब्दों में
बाँधा , जिसे पढ़कर आज के वैग्यानिक अचंभित हैं । एक से एक नई-नई खोज, आज भी
वहाँ नहीं पहुँच सकी; जहाँ हमारे ऋषि- मुनि सैकड़ों वर्ष पहले पहुँच चुके
हैं ।