चांदनी रात

चांदनी रात ढल रही होती,
मैं जुगनू सी जल रही होती!

वो मेरा नाम इस तरह लेता,
धडकन-धडकन मचल रही होती!

बरसता बन के सावन, जो
मन की धरती झुलस रही होती!

वो खत हवा में उडा रहा होता,
जुल्फ़ मेरी बिखर रही होती!

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