शब-ए-फुरक़त में तू अगर आये
सहरा में समंदर उतर आये
संगदिल कोई न मिला तुझ सा
हम तो देख सारा शहर आये
दर्द मेरा तो लगा अब सोने
और कोई नश्तर नया आये
वक़्त-ए-रुख्सत और कसम ये है
आँख में अश्क़ न नज़र आये
उम्र भर रही हसरत "सागर"
अपनी उल्फ़त की भी सहर आये