यादगार-ए-गुजिश्ता जगाने चले
ख़ुद को फिर आज आज़माने चले
कर गयी हम को दीवाना फ़न की लगन
उक्ता के दोस्त भी सब पुराने चले
दर्द पी कर चले हम तो कू -ए-ग़ज़ल
फिर से हैं रस्म -ए-उल्फत निभाने चले
बाक़ी उम्मीद की लौ नहीं बिन तेरे
ज़िन्दगी “सागर ” अब किस बहाने चले