भारतीय भाषाओं को रोटी से जोड़ने के लिए कार्यरत हिंदी आंदोलन का वार्षिक
उत्सव एवं सम्मान समारोह पुणे में संपन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता
वयोवृद्ध गांधीवादी चिंतक और समाज सेविका पद्मभूषण शोभनाताई रानडे ने की।
सुपर कम्प्युटर के जनक पद्मश्री डॉ. विजय भटकर को इस अवसर पर संस्था द्वारा
हिंदी भूषण सम्मान से अलंकृत किया गया। महाराष्ट्र राज्य साहित्य हिंदी
अकादमी के अध्यक्ष डॉ. दामोदर खड़से मुख्य अतिथि थे। हिंदी आंदोलन की
स्मारिका "हमलोग' का लोकार्पण भी इस अवसर पर किया गया। डॉ. भटकर को
सम्मानस्वरूप मॉं सरस्वती की प्रतिमा, स्मृतिचिह्न, शॉल, श्रीफल और पौधा
भेंट किया गया। डॉ खडसे का भी राज्य साहित्य अकादमी का अध्यक्ष बनने की
प्रसन्न्ता में विशिष्ट सम्मान किया गया। आरंभ में संस्था के अध्यक्ष ने
शॉल, श्रीफल, स्मृतिचिह्न और पौधा देकर शोभनाताई का सम्मान किया।
सुश्री शोभनाताई ने अपने भाषण में कहा कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं
के काम करने में कठिनाइयॉं आती हैं पर हर कठिनाई एक अवसर को भी जन्म देती
है। राष्ट्रभाषा का काम सच्चा गांधी विचार है। इस काम के किए हिंदी आंदोलन
बधाई का पात्र है। बहुभाषी भारत की नब्ज़ पकड़ सकने के लिए राष्ट्रभाषा,
मातृभाषा के साथ पड़ोसी राज्य की भाषा भी सीखनी चाहिए। केवल हिंदी ही ऐसी
भाषा है जिसमें अन्य भाषाओं को साथ लेकर चलने का सामर्थ्य है। उन्होंने
इच्छा जताई कि हिंदी आंदोलन का काम इतना व्यापक हो कि देश के हर गली कूचे
में राष्ट्रभाषा का महोत्सव मनने लगे।
डॉ. विजय भटकर ने कहा कि किसी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए आवश्यक है
कि लोकमान्यता और राजमान्यता के साथ-साथ उसमें आधुनिक तंत्रज्ञान को समाहित
कर सकने की क्षमता भी हो। हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि इस कसौटी पर खरी
उतरती हैं। हिंदी को विश्वभाषा के रूप में स्थापित करने के लिए बहुत जरूरी
है कि सभी भारतीय मोबाइल,लैपटॉप,, आईपॉड, कम्प्युटर में देवनागरी का प्रयोग
करे। हिंदी को विज्ञान की भाषा बताते हुए उन्होंने जानकारी दी कि राष्ट्रीय
विज्ञान सम्मेलन में शोधनिबंध हिंदी में पढ़े जायेंगे। वर्तमान बहुभाषिकता
का है। संंसार भर में एक वाक्य में अनेक भाषाओं के शब्द आने लगे हैं। ऐसे
में भविष्य की भाषा पर विचार होना जरूरी है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया
कि तकनीकी क्षेत्र में हिंदी के विकास के लिए हिंदी आंदोलन सार्थक कार्य
करेगा। हिंदीभूषण' सम्मान के लिए संस्था का धन्यवाद करते हुए उन्होंने कहा
कि शोभनाताई से पुरस्कार लेना साक्षात गांधीजी से पुरस्कार लेने जैसा है।
डॉ.दामोदर खडसे ने कहा कि पिछले 16 वर्षों से हिंदी एवं अन्य भारतीय
भाषाओं के लिए कार्यरत हिंदी आंदोलन शहर से खड़ा हुआ सकारात्मक और रचनात्मक
आंदोलन है। संजय भारद्वाज के सपनों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि
जिनके पास सपने हैं, उन्हीं के पास भविष्य भी है। सपनों के बिना व्यक्ति
आगे बढ़ ही नहीं सकता। भाषा को रोटी और संस्कृति से जोड़ने के लिए आंदोलन
प्रशंसा का पात्र है। डॉ. खडसे ने याद दिलाया कि एक समय था जब कम्प्युटर
कक्ष के बाहर बोर्ड लगा होता था-" जूते यहॉं उतारिये' जबकि कम्प्युटर आज
जूतों की दुकान में बैठा है। नए अन्वेषण, नए अनुसंधान सतत होते रहते हैं,
प्रसन्नता की बात है कि हिंदी अनुसंधान और तकनीक की भाषा भी बनकर उभर रही
है।
हिंदी आंदोलन के संस्थापक-अध्यक्ष संजय भारद्वाज ने कहा कि भाषा
संस्कृति की वीणा है। यदि भाषा हारती है तो एक समूची संस्कृति खतरे में प़ड़
जाती है। भाषा को कोरी भावुकता बतानेवाले भूल जाते हैं कि युद्ध भी भावुकता
के धारातल पर ही लड़े जाते हैं। शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं न होने से
समाज में मौलिक चिंतन का अभाव दिखाई देता है। यही कारण है कि ज्ञान पाने के
लिए विश्व जिसके द्वार पर आता था, आज उस देश का कोई भी विश्वविद्यालय
दुनिया के पहले 1000 की सूची में भी स्थान नहीं पाता। नई पीढ़ी को भारतीय
संदर्भों की जानकारी नहीं दी गई । इसके चलते ये पीढ़ी " कॉपी-पेस्ट' पीढ़ी हो
गई है। अपनी भाषा के प्रति उदासीनता देवनागरी लिपि के लुप्त होने का खतरा
पैदा कर रहा है। आंदोलन के भविष्य की योजनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने
कहा कि आंदोलन नींद में नहीं अपितु नींद उड़ा देनेवाले सपने देखता है।
इस अवसर पर हिंदी के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए
सर्वश्री ज. गं. फगरे (संचालक-महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति), सु.
मो. शाह ( कार्याध्यक्ष-महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा), डॉ. सुनील केशव देवधर
(कार्यक्रम अधिकारी-पुणे आकाशवाणी), प्रदीप निफाडकर ( सहसंपादक-लोकमत),
दिनेश चंद्रा ( संपादक-साप्ताहिक हडपसर एक्स्प्रेस),कपूरचंद अग्रवाल (
पूर्व प्रबंध संपादक-समग्र दृष्टि), डॉ.राजेंद्र श्रीवास्तव (वरिष्ठ
राजभाषा अधिकारी- बैंक ऑफ महाराष्ट्र), राकेश श्रीवास्तव ( प्रमुख-साहित्य
संगीत कलामंच), अशोक मंगल ( पूर्व संपादक-सीधी बात) और सुश्री रेखा मंत्री
( संपादिका-मधु संचय) को संस्था की ओर से "हिंदीश्री' सम्मान से सम्मानित
किया गया। सम्मान में स्मृतिचिह्न,श्रीफल और पौधा दिया गया।
स्मारिका की जानकारी सुधा भारद्वाज ने दी। आभार अनिल अब्रोल ने किया। संचालन स्वरांगी साने का था। मेजर सरजूप्रसाद, मीनाक्षी भालेराव और अपर्णा कडसकर ने कार्यक्रम की सफलता के लिए विशेष प्रयत्न किए। भारतीय भाषाओं के क्षेत्र में कार्यरत गणमान्य एवं आम लोग बड़ी संख्या में कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। समापन प्रीतिभोज से हुआ।