कोई इस नाचीज़ को ही चीज़ कह गया
खद्दर के दुशाले को कमीज़ कह गया
आज तअज़्ज़ुब हो गया इस कदर आनन्द
इक अजनबी आके ह्मे अज़ीज़ कह गया
चलो फिर से दिवाली का इक जश्न मनाना है
गिले शिकवे के तिमिर से मुक्त मन बनाना है
अमावस की निशा में तो हर ज्योति निराली है
भव्य दीपामालाओं से अपना गुलशन सजाना है
आज फिर किसी का दीदार हो रहा था..
ये बंदा भी कुछ समझदार हो रहा था
मैं कुछ हैरत में पड़ गया यारो..कौन सा
नुस्खा इस मौसम असरदार हो रहा था
मुस्कराकर जब उन्होंने दी गालियां.
गुलाब की तरह खिल उठी गालियां
अँखियों में समाई हैं जब वादियां
शराब से कहीं नशीली हुई गालियां...
es tarah sb parv manate rhe....
soch badli nhi..aur satate rhe...
saamne kuchh kahe..bs rulate rhe
kabhi devi kahe..kabhi durga kahe..
pr roj kisse vhi..aate jaate rhe..
माना कि ख्वाब तेरे, उस महताब से तो कुछ कम नहीं हैं...
दस्तक देकर देख जरा,तेरे अहबाब तो हम होके रहेंगे........
श्रृंगार को वो हथियार बना के चल दिए ...
अंगार को वो यार बना के चल दिए...
छिपा के असली पहचान अपनी...
दिल के दरवाजे पर एक प्रहार कर के चल दिए .......