ग़ज़ल

तिमिर से लड़ते दीपक का अथक विश्वास देखा था
ये खण्डहर कह रहे थे हमने भी इतिहास देखा था ।

हैं दुर्बल गात पीले पात दीमक ने जड़े खा लीं
इसी बुढि़याए पीपल ने कभी मधुमास देखा था ।

थकी मांदी सी लेटी रेत पर बस आँख में पानी
कि हमने जिस नदी को बहते बारहों मास देखा था ।

है उसके पंख खुद पर बोझ शायद आज ये माना
कभी जिनकी उडा़नों ने खुला आकाश देखा था ।

उजाला देखकर आँखें मेरी खुलने से कतरातीं
इन्हीं आँखों से हमने भोर का विन्यास देखा था ।

बना कर हाथ को तकिया वो अब फुट्पाथ पर सोता
कभी जिस शख्स में गणतंत्र का उल्लास देखा था ।

यही वो लोग है जो हाथ में पत्थर उठाए हैं
इन्ही में ’आरसी’ ने प्रीत का विश्वास देखा था ।

-आर सी शर्मा ’आरसी’

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