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बृजेश यादव

 

 

 

मौला! जीतेजी कभी फ़र्ज ना ईमान से जाऊँ
नाम लेते हुए तेरा ही जान से जाऊँ
नेकी का ओढ़ के कफ़न जहान से जाऊँ
चार कन्धों पे मैं जाऊँ तो शान से जाऊँ

 

मेरे सब अरमान उस पल बस मेरी आहों में थे
जिनकी हम राहों में थे वो ग़ैर की बाहों में थे

 

जिस तरह से आदमी अब क्रूर दानव हो गया
लगता है पाषाण युग का आदिमानव हो गया

 

मेरे चेहरे पे तुमने मले थे जो रंग
वो सब रंग तो पानी से धुल जाऐंगे
पर उनको मैं धोऊं भला किस तरह
जो रंग प्रीत के मन में घुल जाऐंगे

 

anjumanme

मिलन में तू बिछडन में तू ही,
पाने में या खोने में
हर लम्हा महफूज है तेरा,
मेरे दिल के कोने में

 

 

कुछ तो आखिर है दरमियाँ अपने,
तेरे जाने से आंख नम क्यों है ?
वरना मुझसे ये पूछता न खुदा,
हर दुआ में मेरा सनम क्यों है ??

 

 

 

आओ चांद और गगन की बात करें
दिल से दिल के मिलन की बात करें
कुछ समय तो भी सुनें मन की बात
हर समय तो न धन की बात करें

 

 

दंगल बना के रखदी है संसद बचाइए,

ये साँड लोकतंत्र के हमने ही चुने हैं,

चर चर के चबा जाऐंगे भारत बचाइए

 

तब ग़ज़ल ये हुई रौशनी की तरह ...............

 

बेअसर सी ग़जल में बज़न आ गया .............

 

.मेरा दावा है आलम बदल जाएगा .......

 

ख़ुशबुएँ कैद मत करो यारों ...

 

 

 

 

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